उठते रहते नित भाव नये हर मन में जाने अनजाने
जो दे जाते आधार नये सपने गढ़ने के मनमाने।

नित समय बदलता रहता जग में करता रहता परिवर्तन
सहयोगी बन कर प्रकृति सदा करती रहती नित नव सर्जन।
परिवर्तन के सँग जगती-सोती मन की इच्छायें आशायें-
धुंधले पड़ जाते चित्र पुराने सुखप्रद जाने-पहचाने  ।।1।।

जैसी उठती गिरती रहतीं सागर में लहरियाँ क्षण-प्रतिक्षण
वैसे ही मन के सागर में चलता  है विचारों का नर्तन
लहरें तट तक आ बार-बार रच जातीं सुन्दर रेखायें-
वैसे ही मन की भाव तरंगे बुनती नयी ताने-बाने  ।।2।।

सब देख-भाल भी आये दिन, सब समझ बहुत कम पाते हैं
बिन समझे भी सब कुछ हम सब परिपाटी सदा निभाते हैं।
यों ही बढ़ती जाती दुनियाँ, नित सपनों की नादानी में-
जिसको देखो गाता रहता अपने ही सुख-दुख के गाने  ।।3।।

कुछ जानकर समझातें हैं इस नश्वर जग की सच्चाई 
पर अपने सुन्दर सपनों में सोई दुनियाँ न समझ पाई।
है पावन प्रेम अचूक दवा जीवन में हर बीमारी की-
यदि इतना जायें समझ तो फिर भरना न पड़े कोई हरजाने  ।।4।।

धोखा, फरेब, बेईमानी ही जीवन को दुखी बनाते हैं
ना-समझी से अपनी खुद सब गड्डे में गिरते जाते हैं।
निर्मल मन से यदि सब सबके ऊपर गंगाजल बरसायें-
तो सुन न पड़े इस दुनियाँ में किसी से भी कभी कोई ताने  ।।5।।