फिर भी ज़िंदगी हसीन है… 


आज एक सज्जन ने फ़ोन करा और कहा, वे मुझसे डिजिटल एवं सोशल मीडिया मार्केटिंग पर चर्चा करने के लिए मिलना चाहते हैं। मेरा मानना है कि अगर कोई आपको कुछ नया सिखाना चाहता है तो आपको अपनी ओर से प्रयास ज़रूर करना चाहिए। मैं तुरंत उनसे बात करने के लिए राज़ी हो गया। मैंने उनसे कहा, ‘बताइए सर, आप क्या नई जानकारी साझा करना चाहते हैं।’ वे तुरंत बोले, ‘सर, मैं काफ़ी दिनों से आपकी पोस्ट को पढ़ रहा हूँ और मुझे लगता है आपको डिजिटल एवं सोशल मीडिया मार्केटिंग को थोड़ा बदलना चाहिए एक नया प्लान बनाना चाहिए।’ 

मुझे उनकी बात उचित लगी, मैंने तुरंत उन्हें विस्तार से बताने के लिए कहा तो वे बोले या तो आप मेरे कार्यालय आ जाइए या मैं  आपके कार्यालय आ जाता हूँ। मैंने उनके कार्यालय जाने का निर्णय लिया जिससे वे जो बताना चाहते हैं मैं उसे विस्तार से, प्रैक्टिक्ली समझ सकूँ। हमने एक समय तय किया और तय समय पर मैं उनके कार्यालय पहुँच गया। 

मैं उनके विशाल व्यवस्थित और चमक-दमक वाले कार्यालय को देख अचंभित था। पूरे वातावरण को देख लग रहा था कि मैं आज किसी ज्ञानी व्यक्ति से मिलने वाला हूँ। अंदर घुसते ही उनके कार्यालय की रिसेप्शनिस्ट ने मुझसे कहा, ‘आईए भटनागर सर, सर आपका ही इंतज़ार कर रहे हैं।’ पहली मुलाक़ात में अनजान से अपना नाम सुन अच्छा लगा लेकिन मैं इस तकनीक को समझता था इसलिए मुस्कुराहट के अलावा कुछ बोलने के स्थान पर उसके साथ उन सज्जन के केबिन में पहुँच गया।

उन सज्जन ने औपचारिक बातचीत के बाद पूरे तामझाम के साथ अपना प्रेज़ेंटेशन शुरू किया। शुरुआत में तो मुझे सब ठीक लगा और मैं पूरे ध्यान से उन्हें सुनता रहा, पर थोड़ी ही देर में मुझे एहसास हो गया कि वे पूर्व में किए गए हर कार्य पर सिर्फ़ प्रश्न खड़ा कर रहे हैं और उनके खुद के पास कोई समाधान नहीं है। मैं समझ गया कि वे  ‘गूगल ग्रैजुएट’ हैं और अपने ज्ञान से नहीं बल्कि अपने तामझाम से मुझे प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। मुझे विश्व विख्यात कथाकार तुर्गनेब की एक बहुत छोटी लेकिन दिलचस्प कहानी याद आ गई। मैंने तुरंत बातचीत को विराम दिया और सोच-विचार कर बताने का कहकर वहाँ से 
रवाना हो गया। आईए दोस्तों सबसे पहले तुर्गनेब की वह छोटी सी कहानी पढ़ लेते हैं। 

एक मूर्ख स्वयं को बुद्धिमान मानता था लेकिन जैसे ही कुछ भी बोलता था लोगों को उसकी असलियत समझ आ जाती थी और वह उपहास का कारण बन जाता था और अकसर ही अपमानित होकर वापस लौटा करता था। एक दिन वह इस बात की वजह से काफ़ी दुखी था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए? काफ़ी सोच विचार करके उसने शहर के सबसे बड़े विद्वान से इस विषय पर सलाह लेने का निर्णय लिया।

अगले दिन सुबह-सुबह वो विद्वान के घर पहुँचा और उन्हें प्रणाम कर बोला, ‘आप तो इस देश के सबसे बड़े विद्वान हैं, कृपया मुझे मेरी समस्या का हल बताइए, मैं जहाँ भी जाता हूँ लोग मेरा मज़ाक़ उड़ाते हैं। कृपया कोई ऐसा मंत्र बताइए जिससे मेरी ख्याति बुद्धिमान के रूप में फैल जाए।’ 

विद्वान को मूर्ख की बात सुन हँसी आ गई और उन्होंने उसका मखौल उड़ाने का सोचा। उन्होंने उस मूर्ख को अपने पास बुलाया और उसके कान में कुछ कहा। इसके बाद उन्होंने उसे विश्वास दिला दिया कि ऐसा करने से उसकी मनोकामना पूरी हो जाएगी। मूर्ख ने विद्वान को धन्यवाद दिया और वापस आ गया और उसी दिन से उनकी दी हुई सलाह पर काम करने लगा। कुछ ही दिनों में उसकी गिनती प्रदेश के बड़े-बड़े विद्वानों में होने लगी। हर कोई उसके किस्से सुनाया करता था कि कैसे वो एक मूर्ख से विद्वान बन गया। 

कई वर्षों बाद किसी ने उस विद्वान से पूछा, ‘पंडित जी आपने उस मूर्ख को ऐसा कौनसा मंत्र दे दिया जो वो इतना विद्वान बन गया?’ पंडित जी बोले, ‘नहीं-नहीं मैंने उसे कोई मंत्र-वंत्र नहीं दिया। मैंने तो उसका मखौल उड़ाने के उद्देश्य से यह कहा था कि दूसरे जो कुछ भी कहें उसका खंडन करते हुए ठीक उसकी उल्टी बात इतनी ज़ोर देकर कहना कि लोग उस कथन के समर्थन में हो जाएँ उन्हें उसमें दम नज़र आने लगे। पर मुझे इस बात का अहसास नहीं था कि लोग इतने मूर्ख होंगे के उस मूर्ख को ही विद्वान समझने लगेंगे।

जी हाँ दोस्तों आजकल इस मंत्र को अपनाकर हज़ारों मूर्ख, मूर्ख समुदाय में विद्वानों की तरह प्रख्यात हैं। आप जब भी किसी कार्य के लिए किसी भी विशेषज्ञ को चुनें तो याद रखें हमें उसके दिखावे से ज़्यादा ध्यान उसके ज्ञान पर देना है क्यूँकि आपको आगे उसका दिखावा नहीं उसका ज्ञान ले जा सकता है। 

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 
dreamsachieverspune@gmail.com