वाराणसी. यूपी पुलिस (UP Police) की कार्यशैली का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) को एक बुजुर्ग पिता को इंसाफ दिलाने के लिए आगे आना पड़ा है. एक ऐसा पिता जो पूरे लॉकडाउन के दौरान बनारस की गलियों की खाक छानी और पुलिस स्टेशन की चौखट पर अपने कलेजे के टुकड़े की तलाश में पहुंचे. इसके बावजूद उनकी सुनने वाला कोई नहीं था. वह भी तब जब खुद पुलिस बुजुर्ग पिता के पुत्र के गुमशुदगी की जिम्मेदार हो. मामला बीएचयू (BHU) के छात्र शिव कुमार त्रिवेदी (Student Shiv Kumar Trivedi) से जुड़ा है जो पिछले 7 महीने से लापता है. चौंकाने वाली बात यह है कि इस छात्र की गुमशुदगी की रिपोर्ट जिस थाने में लिखी गई, उसी थाने से शिव त्रिवेदी लापता हुआ.गुमशुदा शिव त्रिवेदी बीएचयू के विज्ञान संस्थान के द्वितीय वर्ष के छात्र हैं. शिव वाराणसी के लंका थाने से 13 फरवरी से गायब हैं. वह मूल रूप से मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं. छात्र के पिता प्रदीप कुमार जब शिव से दो दिन तक मोबाइल से संपर्क नहीं कर सके तो वह तत्काल बीएचयू पहुंचे. वहां उनके दोस्तों व छात्रों से पूछताछ की. छात्रों ने बताया कि उसे 13 तारीख की रात डायल 112 पुलिस लेकर गयी थी. पिता तुरंत वाराणसी के लंका थाने पहुंचे, लेकिन उन्हें वहां उनका बेटा नहीं मिला. पुलिस ने इस बाबत कोई जानकारी भी नहीं दी.

लॉकडाउन में बनारस की गलियों में भटकता रहा पिता
मामले में पुलिस का खेल अब शुरू होता है. लाचार पिता बनारस की गलियों में अपने पुत्र को ढूंढता है, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिलता. फिर थक हार कर वो लंका थाना पहुंचते हैं और अपने पुत्र की गुमशुदगी का रिपोर्ट दर्ज कराते हैं. वही जगह जहां से उनका बेटा गायब होता है. उसके बाद पुलिस रिपोर्ट लिख कर शांत हो जाती है, लेकिन पिता पूरे 6 महीने तक घाटों पर रात बिता कर अपने पुत्र शिव की तलाश करते हैं.

मामले में हाइकोर्ट की एंट्री
मामले में हाइकोर्ट की एंट्री तब होती है, जब बीएचयू के पूर्व छात्र व वर्तमान में हाइकोर्ट के वकील पीड़ित पिता के पास पहुंचे. एडवोकेट सौरव पीड़ित पिता के साथ लंका थाने जाते हैं, जहां से जवाब न मिलने पर वह तत्कालीन एसएसपी प्रभाकर चौधरी के पास जाते हैं. एसएसपी ने पीड़ित पिता का दर्द समझा और मामले में उस दिन ड्यूटी में लगे 112 के गाड़ी और पुलिसकर्मी को तलब किया. तब जाकर यह खुलासा होता है कि छात्र को उठा कर थाने में सौंपा गया था. थाने में तैनात पुलिसकर्मियों से पूछताछ होती है तो उस वक्त के थाना अध्यक्ष भारत भूषण तिवारी ने बताया कि छात्र की मानसिक हालात ठीक नहीं थी, इसलिए उसे रात को ही छोड़ दिया गया.

वाराणसी पुलिस बनी है आरोपी
इसके बाद वकील सौरव ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाइकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस को आदेश दिया कि छात्र को ढूंढ़ कर लाए या फिर सीबीआई जांच के लिए तैयार रहे. मौजूदा एसएसपी अमित पाठक ने हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद आनन-फानन में उस वक्त के दरोगा और सिपाही समेत पांच लोगों को मामले में लापरवाही बरतने पर निलंबित कर दिया. लेकिन, छात्र शिव अभी तक नहीं मिला. मामला हाईकोर्ट में चल रहा है, जिसमें वाराणसी पुलिस आरोपी बनी हुई है. 22 सिंतम्बर को बड़ा फैसला होने को था, लेकिन जजों के बेंच बदलने के कारण अगली सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर की तारीख रखी गयी है.

12 अक्टूबर को अगली सुनवाई
12 अक्टूबर की तारीख मिलने पर भले ही पुलिस को थोड़ी राहत मिली हो, लेकिन इस पूरे मामले में पुलिस की बड़ी लापरवाही उजागर हुई है. किसी छात्र को 112 द्वारा उठाना और थाने को सौंपना, फिर उसे छोड़ देना यह कहकर की उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी. सवाल यह है कि यदि छात्र की हालत ठीक नहीं थी तो उसे उसके परिजनों को बुलाकर क्यों नही सौंपा गया या फिर उसे किसी असप्ताल में भर्ती क्यों नहीं करवाया गया. ऐसे कई सवाल हैं जो जिनका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है.