फिर भी ज़िंदगी हसीन है…
 

दोस्तों जीतना, लक्ष्यों को पाना और हर हाल में बड़ा आदमी बनना जैसी चाहतों में हम अक्सर जीवन के मूल मक़सद से भटक जाते हैं और ज़िंदगी को जीने के स्थान पर काटने लगते हैं। लेकिन दोस्तों जीत या हार के विचार को छोड़कर अगर हम करुणा और मानवता के साथ जागरूक रहते हुए जीवन जीना शुरू कर दें तो इस जीवन को सही मायने में जिया हुआ माना जा सकता है। आइए अपनी बात को मैं आपको एक कहानी के माध्यम से समझाता हूँ-

बात कई वर्ष पूर्व की है, गाँव में एक बहुत गरीब लड़का रहता था। माता-पिता की मृत्यु कई वर्ष पूर्व हो जाने के कारण वह मज़दूरी करके अपना पेट भरा करता था। उसी गाँव में एक बौद्ध मठ भी था। एक दिन उस लड़के से किसी ने कह दिया कि वह मठ में जाकर कोई काम क्यों नहीं कर लेता? युवक को उस व्यक्ति का विचार पसंद आ गया। वह तत्काल मठ के मुख्य भिक्षु के पास पहुँच गया और उन्हें हाथ जोड़कर विनती करते हुए काम और भोजन देने की विनती करने लगा।

मुख्य भिक्षुक ने जब उसकी शिक्षा और कौशल के बारे में पूछा तो वह बोला, ‘महात्मन, मैं कभी विद्यालय नहीं गया हूँ और मुझे साफ़-सफ़ाई करना आदि जैसे छुटपुट कार्य आते हैं। इसके अलावा में थोड़ा बहुत शतरंज खेल लेता हूँ।’ युवक की बात सुनते ही भिक्षुक ने उससे कहा, ‘देखो, मठ के नियमानुसार मैं बिना तुम्हारी परीक्षा लिए प्रवेश नहीं दे सकता हूँ। चूँकि तुम पढ़े-लिखे नहीं हो इसलिए मैं तुम्हारे खेल में तुम्हारी परीक्षा लूँगा।

भिक्षुक ने अपने शिष्य से शतरंज की बिसात जमाने के लिए कहा और खेल के नियम समझाते हुए उस युवक से बोला, ‘अगर तुम इस खेल में जीत गए तो तुम्हें इस मठ में रहने और खाने को मिलेगा और हार गए तो मैं तुम्हारी कुछ मदद नहीं कर पाऊँगा।’ इसके साथ ही भिक्षुक ने एक तलवार निकाल कर शतरंज के पास रखते हुए कहा आज के खेल में जो भी जीतेगा वह दूसरे की नाक काट देगा।’

युवक शर्तों को सुन थोड़ा घबरा गया लेकिन कोई अन्य उपाय या रास्ता न देख खेल खेलने के लिए राज़ी हो गया। खेल की शुरुआत में उस युवक ने घबराहट और डर के मारे चाल चलने में कुछ ग़लतियाँ कर दी। देखने वालों को लग रहा था कि युवक के लिए बाज़ी जीत पाना असम्भव ही रहेगा। लेकिन उसी वक्त उस युवा ने सोचा, ‘मेरे पास सिर्फ़ यही एक मौक़ा है। अगर डर या घबराहट की वजह से मैं चूक गया तो न सिर्फ़ मेरी नाक कट जाएगी बल्कि रहने-खाने और काम करने का हाथ आया मौक़ा भी छूट जाएगा।’ विचार आते ही उसने अपने सौ प्रतिशत ध्यान को खेल पर केंद्रित किया और आने वाली कुछ चालों में ही भिक्षुक से जीतने की स्थिति में आ गया।

स्थिति पर पकड़ मज़बूत होते ही उस युवा ने भिक्षुक की ओर देखा वे बिलकुल भी घबराए हुए तो नहीं लेकिन हार की स्थिति में आने की वजह से थोड़े चिंतित ज़रूर लग रहे थे। भिक्षुक के चेहरे के भाव समझ में आते ही उस युवा ने सोचा, ‘अगर मैं हार गया और मेरी नाक कट भी गई तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा। मैं तो पहले से ही बुरे हाल हूँ, इससे बुरा तो कुछ हो ही नहीं सकता है। लेकिन अगर महात्मन हार गए तो गड़बड़ हो जाएगी। वे तो पढ़े-लिखे संत हैं, लोग उन्हें अपना गुरु मानते हैं ऐसे में उनका हारना ग़लत हो जाएगा।’

यह विचार आते ही उस युवा ने भिक्षुक की ओर देखते हुए जानबूझकर ग़लत चाल चल दी। जिससे की सामने बैठे साधु फ़ायदा उठा लें और खेल जीत जाएँ। उस युवक के ऐसा करते ही भिक्षुक खड़े हो गए और तलवार की नोक से मोहरों को गिराते हुए बोले, ‘युवक तुम जीत गए! यहाँ शतरंज का खेल नहीं बल्कि तुम्हारे चरित्र की परीक्षा चल रही थी और तुम उसमें पास हो गए।’

उस युवक को कुछ समझ नहीं आया, वह प्रश्नवाचक निगाहों के साथ भिक्षुक को देखने लगा। भिक्षुक तुरंत उस युवक की दुविधा समझ गए और बोले, ‘मैं तुम्हें खेल में नहीं बल्कि तुम्हारे सोचने, कार्य करने के तरीक़े में परखना चाहता था। इस खेल के दौरान तुमने अपने अंदर दो बहुत महत्वपूर्ण सिद्धियाँ, गुण दर्शाए। इन गुणों के बिना आत्म-साक्षात्कार होना असम्भव है।

खेल के शुरुआती दौर में जब तुम घबराहट और डर की वजह से थोड़ा ख़राब खेल रहे थे तब तुमने अपनी ऊर्जा और एकाग्रता का परिचय देते हुए खेल पर अपनी पकड़ बनाई अर्थात् तुम पूरी तरह जागरूक थे, यह महा प्रज्ञा है। दूसरा, जब जागरूक रहते हुए तुमने खेल पर पकड़ बना ली और तुम जीतने की स्थिति में आ गए तब तुमने अपने प्रतिद्वंदी की ओर करुणा से देखा और जानबूझकर गलती करी ताकि वह जीत सके अर्थात् तुमने करुणा, अनुकंपा का प्रदर्शन करा। अपने जीवन को सार्थक करने के लिए यह दो गुण पर्याप्त हैं। तुम इस मठ में हमारे साथ रह सकते हो।’

जी हाँ दोस्तों, अगर आप अपने जीवन में, रिश्तों में जीवंतता बनाए रखना चाहते हैं तो याद रखें जीवन में जीतने या हारने के लिए कुछ है ही नहीं। जीतने से मिलने वाले आनंद या या हारने से मिलने वाली पीड़ा दोनों ही तात्कालिक है। आप सीमित मात्रा में मिले अपने समय का अपनी सोच, नज़रिए के आधार पर, उन्हीं परिस्थितियों से अधिक से अधिक आनंद ले सकते हैं अथवा पीड़ित हो सकते हैं। अर्थात् आनंद हो या पीड़ा दोनों ही हमारी कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं है। भोग, दुःख, जीत या हार से परे जाकर जीना ही सही जीवन जीना है जिस पर उस युवा समान कुछ लोग ही चल पाते हैं। तो दोस्तों आज से याद रखिएगा जीत हो या हार, आपको एक महान जीवन व्यतीत करना है।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com