• फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


जीवन में कई बार कुछ पल ऐसे आते हैं जो उस वक्त तो बड़े साधारण या कई बार इसके एकदम विपरीत एकदम बहुत कठिन और बुरे लगते हैं, लेकिन बीतते समय के साथ हमको एहसास होता है कि उस एक पल ने ही हमारे पूरे जीवन को बदल दिया है और ऐसा एक पल हर इंसान के जीवन में कभी ना कभी आता ही है। 

बात वर्ष 2007 की है, अपने गुरु श्री राजेश अग्रवाल जी के मार्गदर्शन में मैंने अपनी पढ़ाने और एक दोस्त के रूप में मार्गदर्शन करने की क्षमता को पहचाना था। सर ने ही मुझे इस बात का विश्वास दिलाया था कि अपनी मूल क्षमता के अनुरूप कार्य करने से सफलता के साथ संतुष्टि भी मिलती है और आप अपने जीवन को बेहतर बनाने के साथ-साथ ख़ुशी-ख़ुशी जी सकते हैं।

सर के मार्गदर्शन में ही इस नए ‘मोटिवेशनल स्पीकर’ बनने के अपने सपने को हक़ीक़त में बदलने के लिए मैंने अपने कम्प्यूटर हार्डवेयर के व्यवसाय को बंद कर, लगभग 3 वर्षों तक अपने कौशल को विकसित करने के लिए ट्रेनिंग ली और अक्टूबर 2010 में अपने गुरु के साथ मंच साझा करते हुए इस सपने को पूरा किया। यहाँ तक की कहानी वैसे मैं आपसे विस्तारपूर्वक इसी कॉलम में शेयर कर चुका हूँ।

दोस्तों एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर बनने के साथ ही मुझे 2 मुख्य चुनौतियों से भी निपटना था। पहली, स्वयं को इस नए रूप में स्थापित करना। दूसरी, कम्प्यूटर के व्यवसाय को बंद करते वक्त हुए नुक़सान की वजह से अपने ऊपर चढ़े ऋण को चुकता करना। ट्रेनिंग के बाद यह मेरे जीवन का सबसे मुश्किल और चुनौती पूर्ण वक्त था। ऐसे विपरीत लगने वाले समय में मेरे गुरु ने एक दिन अचानक कह दिया, ‘निर्मल, मैं तुम्हें जो भी सिखा सकता था सब सिखा दिया है। अगर अभी भी सीखते रहोगे तो काम कब और कैसे करोगे? इसके बाद भी तुम्हें लगता है कि कुछ और सीखना बचा है तो तुम्हें सोच विचार के, ज़रूरत अनुसार अगले मार्गदर्शक को चुनना होगा।’

उस रात दिल्ली से वापस उज्जैन आते वक्त सर के द्वारा, इस रूप में अकेले छोड़ने की वजह से मैं बहुत बेचैन था, लेकिन यक़ीन था कि उन्होंने ऐसा कहा है तो निश्चित तौर पर मेरा भविष्य उनकी इन्हीं बातों में छुपा होगा। मैं पूरी रात ट्रेन में विचार करता रहा कि क्या बाज़ार में नए रूप में स्थापित होने के लिए मैं तैयार हो गया हूँ या मुझे कुछ और सीखना बचा है? 

खुद के अंदर झांककर देखने में अपने अंदर कमी तो साफ़ नज़र आ रही थी लेकिन मन गुरु के रूप में राजेश अग्रवाल सर के अलावा किसी और को स्वीकारने के लिए राज़ी ही नहीं था। लेकिन इतना विश्वास था कि अगर सर ने ऐसा कहा है तो ज़रूर मेरे लिए यही बेहतर होगा। रात और ट्रेन का सफ़र इन्हीं विचारों के साथ गुजर गया। 

जीवन में बदलाव के इस दौर में अच्छे साहित्य से जुड़े रहने का महत्व मैं समझ चुका था और मैं इसीलिए अपना ख़ाली समय पढ़ने में लगाया करता था। आप सभी के समान मेरा भी प्रिय लेख श्री एन॰ रघुरामन द्वारा लिखित और दैनिक भास्कर में प्रकाशित ‘मैनेजमेंट फ़ंडा’ ही था। सुबह नागदा पहुँचते ही आदतानुसार मैंने दैनिक भास्कर लिया और उस दिन का लेख पढ़ते-पढ़ते निर्णय लिया कि सीखने की अगली यात्रा श्री एन॰ रघुरामन सर के साथ रहेगी।

उस वक्त दैनिक भास्कर उज्जैन के सम्पादक श्री विवेक चौरसिया जी जो मेरे लिए बड़े भाई समान ही हैं के सहयोग से मैं रघु सर तक पहुँचा और आगामी कुछ वर्षों में उनके साथ कार्य करते हुए मैनेजमेंट की बारिकियाँ सीखी और साथ ही जो कुछ भी आपने सीखा है या जिस क्षेत्र में आप महारत रखते हैं, उसमें उच्चतम जीवन मूल्यों का पालन करते हुए किस तरह अपने सपनों को पूरा किया जा सकता है, यह सीखा। आज दोस्तों जीवन में जो कुछ भी कर पा रहा हूँ वो मेरे इन दोनों गुरुओं के द्वारा दी गई शिक्षा और आशीर्वाद का ही कमाल है। 

अगर आप भी अपने जीवन में कुछ अच्छा और बड़ा करना चाहते हैं तो इन दोनों गुरुओं से सीखे इन 3 सूत्रों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें-

पहला सूत्र - विश्वास रखें 
अपने गुरु पर खुद से ज़्यादा विश्वास रखें और उनके द्वारा कही गई बात पर 100% अमल करें। फिर भले ही वे आपकी सोच के विपरीत क्यूँ ना हो। 

दूसरा सूत्र - उनकी कही बात पर अमल करें 
अगर आपके गुरु आपको पहाड़ से कूदने के लिए भी कह रहे हों तो बिना विचारे कूद जाएँ। यक़ीन मानिएगा वे ऐसा सिर्फ़ आपके फ़ायदे के लिए ही कह रहे होंगे क्यूँकि वे आपको, आपसे ज़्यादा बेहतर तरीक़े से जानते हैं।

तीसरा सूत्र - स्वयं पर विश्वास रखें  
यह जीवन आपका है, इसे बेहतर बनाने की जवाबदारी आपकी है। इसलिए जब गुरु के मुताबिक़ आपकी शिक्षा पूरी हो जाए तब जीवन की कमान खुद सम्भाले और उनसे मिले ज्ञान और अपनी क्षमता पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ें। याद रखिएगा लंगर डाली नाव से नदी पार नहीं होती।

इसी लिए तो कहा गया है, ‘गुरु ज्ञान का सागर है, गुरु पुस्तक का सार। सब पे गुरु महिमा बनी, गुरु जीवन आधार।।’ इन्हीं बातों के साथ अपने सभी गुरुओं और आप सभी को वंदन करते हुए लेख को विराम देता हूँ, साथ ही आप सभी को गुरु पूर्णिमा की बधाई। 


-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 
dreamsachieverspune@gmail.com