फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


कुछ दिन पूर्व पारिवारिक मित्र व उनके परिवार के साथ कुछ वक्त बिताने का मौक़ा मिला। वे बहुत खुश लग रहे थे। पूछने पर पता चला इस वर्ष भी उन्होंने पिछले कई वर्षों की भाँति अपने कार्यालयीन टार्गेट को 31 मार्च के काफ़ी पहले पूर्ण कर दिया है। बातों-बातों में मित्र ने यह भी बताया कि इस बार उनके लिए टार्गेट पूर्ण करना एक और वजह से मायने रखता है। इस वर्ष उन्हें वेतन वृद्धि के साथ अगला बहुप्रतीक्षित प्रमोशन भी मिलना तय है।

मैं मित्र को इस डबल उपलब्धि के लिए बधाई दे ही रहा था कि अंदर से भाभीजी का आना हुआ, मैंने उन्हें व मित्र को साथ बधाई दी। मेरा इतना कहते ही भाभीजी ने कटाक्ष करते हुए कहा, ‘भइया अपने मित्र को ही बधाई दीजिए।’ मैं उनका जवाब सुन स्तब्ध था, फिर भी बात को सम्भालते हुए मैंने कहा, ‘भाभी बिना गृहलक्ष्मी की मदद से सफल होना सम्भव नहीं है। फिर आप…’ मैं पूरी बात कहता उसके पहले ही भाभी ने मुझे बीच में ही रोकते हुए कहा, ‘भइया मैं आपकी बात से सहमत हूँ, लेकिन पैसा व पद सब कुछ नहीं होता। वैसे ही यह इतने व्यस्त हैं कि रोज़मर्रा के छोटे-छोटे काम भी तीन-तीन बार याद दिलाने के बाद यह भूल जाते हैं और हर सप्ताह मेरा शनिवार (साप्ताहिक अवकाश) बाज़ार का काम  निपटाने में और रविवार घर का काम निपटाने में निकल जाता है और सोमवार से वही रूटीन। इनका प्रमोशन कुल मिलाकर मेरी व्यस्तता ही बढ़ाएगा।’ 

मैं सिर्फ़ मुस्कुरा दिया, कुछ बोला नहीं। भाभी के अंदर जाते ही मित्र बोला, ‘यार वह बोल तो एकदम सही रही है, कोई काम सही समय पर कर ही नहीं पाता हूँ। ऑफ़िस जाते वक्त जल्दी रहती है इसलिए सोचता हूँ कि लौटते वक्त यह काम करते हुए आ जाऊँगा और फिर ऑफ़िस की व्यस्तता के चलते मैं अकसर लेट हो जाता हूँ तो घर आने की जल्दी में कुछ याद ही नहीं रहता। फिर यही छूटे हुए छोटे-छोटे काम घर के माहौल को बिगाड़ देते हैं।’

वैसे दोस्तों ज़्यादातर लोगों के साथ ऐसा होता है। सामान ख़रीदकर वापस आने के बाद याद आता है कि हम तो यह लाना भूल गए अथवा शाम को बच्चे का सामान लाकर देने का प्रॉमिस तीन दिन तक चलता रहता है। जबकि हम ऐसा करना नहीं चाहते हैं। ख़ैर इसे यहीं छोड़िए…

मैंने मित्र से पूछा क्या तुमने अपने ऑफ़िस के रास्ते में लॉकर लगवा रखे हैं। वैसे मैं यही प्रश्न आप सभी से भी पूछ लेता हूँ, क्या आपने ऑफ़िस, दुकान अथवा कार्य करने के स्थान जाने के रास्ते में अपने लॉकर रख रखे हैं? नहीं समझ पाए? 

मेरे मित्र भी इस बात को समझ नहीं पाए और बोले, ‘यार ऑफ़िस के रास्ते में लॉकर? चक्कर क्या है?’ पहले मैंने उससे अपनी पसंदीदा आईसक्रीम खिलाने का वायदा लिया और उसके बाद मुस्कुराते हुए उसे लॉकर का राज़ बताया, जो इस प्रकार था। 

मैंने मित्र से कहा, अपने कार्यालय के रास्ते में कोई 10 स्पॉट चिन्हित कर लो जो रोज़ तुम्हारे रास्ते में आते हैं। जैसे घर से बाहर निकलने का दरवाज़ा, गाड़ी की पार्किंग का स्थान, घर के बाद वाला पहला टर्न, रास्ते में बच्चे का पसंदीदा पार्क, मंदिर, कार्यालय की पार्किंग, पूजा का स्थान आदि। फिर इन 10 स्थानों पर एक आभासी (वर्चूअल) लॉकर रख दें। अब घर से निकलने के पहले अपने मन में उन सभी कामों को दोहरा लें जिन्हें आपको आज करना है। बस अब आप ऑफ़िस जाते समय जैसे ही लॉकर का स्थान आए एक काम को उस लॉकर में रख दें। अब दिन में जब भी आपके पास समय हो एक बार इन लॉकर को चेक कर लें और जिन कार्यों को किसी से करवाया जा सकता हो वो पूर्ण कर लें। अंत में जब शाम को आप अपने घर जा रहे हों तो रास्ते में पड़ने वाले हर लॉकर से अपना सामान निकाल लें और जो काम पेंडिंग है उसे पूर्ण करते हुए घर पहुँच जाएँ। ऐसा करना आपको भूलने की वजह से होने वाली गलती को करने से बचाएगा।

दोस्तों आप में से कुछ लोगों को लग सकता है कि जिस काम को एक लिस्ट साथ रखकर किया जा सकता है, उसके लिए इतनी माथापच्ची क्यों? तो मैं आपको एक चीज़ पहले ही बता दूँ कि सब कुछ पाने की आपाधापी और तेज़ी से बदलते इस युग में बिना अपने मस्तिष्क को धारदार बनाए, जीतना सम्भव नहीं है। यह अपने दिमाग़ को धारदार बनाने और प्रोग्राम करने का एक तरीक़ा है। अगर आप ऑफ़िस का स्ट्रेस घर साथ लेकर आने के आदि हैं, तो आप इस लॉकर में से सुबह रखा सामान निकालने के बाद अपने ऑफ़िस के स्ट्रेस को अथवा ऑफ़िस के बचे हुए कार्य को रखने के काम में लेकर घर व कार्यालय में संतुलन बना सकते हैं। वैसे यह तकनीक बच्चों को फ़ार्मूले, पाठ का कोई महत्वपूर्ण अंश या कुछ भी याद रखने के लिए भी सिखाई जा सकती है।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 
dreamsachieverspune@gmail.com