नई दिल्ली । पीएम मोदी ने कूचबिहार की रैली में कहा - अगर मैं कहता कि सारे हिंदू एकजुट हो जाओ तो मुझे चुनाव आयोग का नोटिस आ गया होता.. मतलब मोदी जो कहना चाहते थे कह गए। अमित शाह तो 200 से ज्यादा सीटें निकालने का दावा कर रहे हैं। मोदी-शाह के दावे कितने सच होंगे, ये दो मई को पता चलेगा पर इस विश्वास के पीछे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की वो ताकत है जिसने पश्चिम बंगाल में बीजेपी को नई धार दी है।

संघ ने शहरों की गलियों और गांव की पगडंडियों में तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों के कार्यकर्ताओं से दो-दो हाथ कर बीजेपी के लिए जमीन तैयार की है। खड़गपुर की रैली में मोदी ने यूं हीं दिलीप घोष की तारीफ कर बड़ा संकेत नहीं दिया था। भद्रलोक जो सोचे पर घोष खुद पर हमले झेल कर बीजेपी का झंडा बुलंद करते आए हैं। तभी मोदी को कहना पड़ा - 'मैं क्यों इतना निश्चित हूं कि बंगाल में हमारी सरकार आने जा रही है। यह गर्व की बात है कि हमारे पास दिलीप घोष जैसे नेता हैं। बीजेपी के130 के करीब कार्यकर्ताओं ने अपना जीवन न्यौछावर कर दिया ताकि बंगाल आबाद रहे। दिलीप घोष ना चैन की नींद सोए हैं न दीदी की धमकियों से डरे हैं। उन पर अनेक हमले हुए हैं। मौत के घाट उतारने की कोशिश हुई लेकिन वो बंगाल के उज्ज्वल भविष्य का प्रण लेकर चल पड़े और आज पूरे बंगाल में नई ऊर्जा भर रहे हैं।'
श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि पर जनसंघ के विस्तार, उनके असामयिक निधन से पैदा हुई शून्यता और वामदलों के उभार में हिंदू राष्ट्रवाद से ओतप्रोत दक्षिणपंथी राजनीति के अवसान की चर्चा हम इस लेख में कर चुके हैं -श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नींव, जय श्रीराम की टीस.. दीदी, अब खेला होबे । लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी को उभरने का मौका दिया। राम मंदिर आंदोलन ने संघ को पश्चिम बंगाल में अपनी गतिविधियां बढा़ने का खुराक दिया। पर बीजेपी को कोई राजनैतिक सफलता हासिल नहीं हुई - लेफ्ट ने रोका रास्ता तो ममता ने दिया मौका, पश्चिम बंगाल में संघ का सफर संघ ने रणनीतिक तौर पर आक्रामक रूख तभी तैयार किया जब ममता बनर्जी ने लेफ्ट को उखाड़ फेंका और खुद सत्ता पर बैठी। वैचारिक-सैद्धांतिक दुश्मन के सफाए के बाद 2014 में संघ और बीजेपी ने तय कर लिया कि अब अंतिम प्रहार का समय आ गया है।

हिंदू जागरण मंच के प्रचारक से बीजेपी के अध्यक्ष बने दिलीप घोष ने टीएमसी को उसी की भाषा में जवाब देने की नीति अपनाई। जब गर्दन के बदले गर्दन तोड़ने जैसे बयान उन्होंने दिए तो काफी आलोचना हुई लेकिन 'कार्यकर्ताओं का अपमान नहीं सहने के संकल्प' की आड़ में वो इसे जायज भी ठहराते गए। 2016 के विधानसभा चुनाव में महज तीन सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी को उम्मीद भी नहीं थी कि तीन साल बाद लोकसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत 40 पर पहुंचने वाला है। इसके पीछे संघ का दिमाग काम कर रहा था।
17 दिसंबर 2016 से डायमंड हार्बर में शुरू हुए दो दिनों की चिंतन बैठक में ही संगठन में बदलाव पर मुहर लग गई थी। कैलाश विजयवर्गीय और शिव प्रकाश तब लगातार कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ाने पर काम कर रहे थे। 2017 में बीजेपी ने संघ की सलाह से ही पार्टी संगठन को पांच जोन में बांटा था- उत्तर बंगाल, रार (दक्षिण-पश्चिम), नबाद्वीप (मध्य-दक्षिण), हुगली -मिदनापुर और कोलकाता। राज्य कार्यकारिणी के सदस्यों को जोनल कमेटी में भेजा गया। फिर जिला कमेटियों पर ध्यान दिया गया। 38 जिला कमेटियां बनीं। इसके बाद मंडल कमेटियों को सिर्फ 60 से 70 बूथ की जिम्मेदारी दी गई। पहले एक कमेटी 210 से 270 बूथों का मैनेजमेंट करती थी। फिर शक्ति केंद्रों को मजबूत करने के लिए ऐसे विस्तारकों की जरूरत थी जो अपने गृह जिले से अलग जिलों में जिम्मेदारी संभाले। 2018 तक संघ की मदद से 200 विस्तारक तैयार हो गए। इनमें से अधिकतर या तो स्वयंसेवक थे या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ता।
कैलाश विजयवर्गीय, शिव प्रकाश और महासचिव स्तर के नेताओं ने पूरे प्रदेश का दौरा शुरू किया। लक्ष्य था हर शक्ति केंद्र से संपर्क स्थापित करना। जमीनी स्तर पर शक्ति केंद्रों को अहम सांगठनिक यूनिट के तौर पर चिन्हित किया गया। सोच ये थी कि अगर शक्ति केंद्र मजबूत हो गए तो पन्ना प्रमुखों की पहचान आसान हो जाएगी। नए ढांचे में और अधिक कार्यकर्ताओं की जरूरत थी। बीजेपी का आंकड़ा कम पड़ने लगा। तब संघ ने अहम भूमिका अदा की। संघ ने बेदाग छवि और संगठन बनाने की क्षमता वाले स्वयंसेवकों को बीजेपी में भेजने का काम शुरू किया। हालांकि वाम के अवसान के बाद भारत माता का झंडा थामने वाले वामपंथियों ने भी इसमें मदद की क्योंकि उन्हें बूथ मैनेजमेंट की तगड़ा अनुभव था।
2016 के विधानसभा चुनाव तक स्टेट यूनिट में तीन प्रचारक थे - दिलीप घोष, संगठन महामंत्री अमलेंदु चट्टोपाध्याय और सह संगठन महामंत्री सुब्रत चट्टोपाध्याय। चुनाव के बाद अमलेंदु वापस संघ में भेज दिए गए और उनकी जगह ले ली सुब्रत चट्टोपाध्याय ने। पर्दे के पीछे दिन-रात वो रणनीति बनाने में लगे रहे। दिलीप घोष के साथ उनका तालमेल जबर्दस्त रहा है। अमलेंदु की जगह संघ ने दीपांजन गुहा को भेजा जो हुगली यूनिट में सक्रिय थे। सुब्रत और दीपांजन को बिना लाइमलाइट में रहे संगठन की रणनीति और भविष्य की योजनाओं पर काम कर रहे थे। वहीं दिलीप घोष को खुल कर खेलने की आजादी दी गई। बाद में दीपांजन गुहा को बीजेपी का प्रशिक्षण प्रमुख बना दिया गया।

2017 आते-आते स्टेट यूनिट में पांच महासचिव हो गए। इनमें से सायंतन बसु, देबाश्री चौधरी और राजू बनर्जी एबीवीपी बैकग्राउंड से हैं। देबाश्री स्कूल के समय से ही संघ से जुड़ी हुई हैं। वो राष्ट्र सेविका समिति की सदस्य रही हैं। चौथे महासिचव प्रताप बनर्जी 90 के दशक से ही संघ से जुड़े थे। पाचंवे महासचिव बने संजय सिंह। वो हावड़ा नगर निगम में कॉरपोरेटर थे पर अपने को स्वयंसेवक कहलाना ज्यादा पसंद करते थे।

जब दिसंबर, 2015 में दिलीप घोष को बीजेपी की कमान सौंपी गई तो उन्होंने सबसे पहले 20 जिलों के अध्यक्षों को बदल दिया। इसके बाद कई सारे परिवर्तन हुए। संघ की मिदनापुर जिले यूनिट के सेक्रेटरी शमित दास को बीजेपी का जिला अध्यक्ष बना दिया गया। सुखमय सतपति को झारग्राम जिलाध्यक्ष बनाया गया। ये भी संघ से ही बीजेपी में आए। विस्तारकों की ट्रेनिंक का पहला कार्यक्रम कोलकाता में 31 अक्टूबर, 2017 से शुरू हुआ। इस काम में शिव प्रकाश, दिलीप घोष, सुब्रत चट्टोपाध्याय, दीपांजन गुहा और श्यामपद मंडल लगे हुए थे। इन सबकी पृष्ठभूमि संघ की थी। 2018 में संघ ने दो और स्वयंसेवकों को बीजेपी में भेजा- किशोर बर्मन और अरविंद मेनन। 2019 में संघ ने अमिताभ चक्रवर्ती को सह संगठन महामंत्री बनाकर बीजेपी में भेजा।

पिछले साल के आखिर में अमिताभ चक्रवर्ती ने सुब्रत चट्टोपाध्याय की जगह ले ली। माना जाता है कि दिलीप घोष के एकाधिकार से चिंतित होकर ये बदलाव किया गया। हालांकि अमिताभ चक्रवर्ती की सांगठनिक कुशलता का लोहा सभी मानते हैं। वो लंबे समय तक दक्षिण दिनाजपुर में प्रचारक रहे। सुब्रत चट्टोपाध्याय ने 2020 तक संगठन को विस्तार भी दिया और मजबूती भी। अब तक बीजेपी पश्चिम बंगाल को अपने संगठन के लिहाज से 40 जिलों और 1255 मंडलों में बांट चुकी थी। सुब्रत के इस काम को अमिताभ चक्रवर्ती ने आगे बढ़ाया। इसी का नतीजा है कि दो चरणों के चुनाव के बाद जो जमीनी रिपोर्ट्स आए हैं, वो बता रहे हैं कि बूथ लेवल पर किसी पार्टी का इकतरफा वर्चस्व नहीं दिखा। मुकाबला कांटे का चल रहा है।