फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


काउन्सलिंग के अपने कार्य में मैंने आमतौर पर पाया है कि रिश्तों में तनाव या समस्या आमतौर पर एक दूसरे से अपेक्षा की वजह से आती है। वैसे रिश्तों में उम्मीद या अपेक्षा रखना चाहिए या नहीं?, यह एक अलग विषय है और इस पर हम फिर कभी चर्चा करेंगे। 

अपेक्षा की वजह से कई बार आपसी बातचीत व्यर्थ बहस का रूप ले लेती है और हम में से ज़्यादातर लोग अकसर इसे समझ नहीं पाते हैं और यह नासमझी रिश्तों में कड़वाहट पैदा करने लगती है। अगर रिश्तों में अपेक्षा की वजह से आयी कड़वाहट, जिसे सामने वाला जानता भी नहीं है, अगर इसे जल्दी दूर ना किया जाए तो यह आपस में झगड़े का रूप ले लेती है और फिर वे दोनों छोटी-छोटी बातों पर बिना रुके, लगातार झगड़ते रहते हैं। अगर समय रहते इस झगड़े को ख़त्म ना किया जाए तो यह आपसी विश्वास को ख़त्म करने लगता है और अगर विश्वास ही ना हो, तो रिश्ता सिर्फ़ एक नाम बनकर रह जाता है।

दोस्तों वैसे आप भी निश्चित तौर पर ऐसे कुछ लोगों को जानते होंगे, जिनके पास सब-कुछ होगा लेकिन उसके बाद भी ग़लत अपेक्षाओं की वजह से वे भावनात्मक रूप से परेशान चल रहे होंगे। ऐसा ही कुछ मेरे एक परिचित के साथ भी हो रहा था। पति-पत्नी व बच्चे सभी व्यक्तिगत तौर पर बहुत अच्छे, समझदार, पढ़े-लिखे और सक्षम हैं लेकिन उसके बाद भी ग़लत धारणाओं, उम्मीद और अपेक्षाओं की वजह से परेशान हैं। 

छोटी-मोटी अपेक्षाओं से शुरू हुआ यह मनमुटाव रिश्तों को ऐसे मोड पर ले आता है, जहां से कई बार ऐसा लगने लगता है कि रिश्ते में सब-कुछ ख़त्म हो चुका है। ऐसी स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण सवाल आता है, क्या वास्तव में ऐसे रिश्तों के ठीक होने की उम्मीद रखना चाहिए? या, क्या ऐसे रिश्तों को ठीक किया जा सकता है? या फिर ऐसे रिश्तों में क्या उम्मीद या अपेक्षा रखी जाए, जो दोनों को ख़ुशी और एक अच्छा साथ दे पाए?

यक़ीन मानिएगा दोस्तों, रिश्ते में आपसी कलह को निश्चित तौर पर कम या खत्म किया जा सकता है, वह भी लगभग तुरंत।
जी हाँ दोस्तों, यह वाक़ई सम्भव है। हमें बस एक महत्वपूर्ण बात को समझना होगा कि आपसी उम्मीद और अपेक्षा कुछ इस तरह होना चाहिए, जो दोनों पक्षों की मानसिक शांति को बरकरार रख सके और ऐसा करना वाक़ई बहुत आसान है, हमें बस अपनी सोच, अपनी मानसिकता को बदलना होगा। अगर आप ऐसा कर पाए तो निश्चित तौर पर ऐसे रिश्तों को अधिक खुशहाल, अधिक शांतिपूर्ण और अधिक उत्पादक बनाया जा सकता है।    

इसके लिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि उम्मीद और अपेक्षा, रिश्तों में किस तरह समस्या उत्पन्न करती है? अपेक्षाएँ ही आमतौर पर झगड़े की जड़ होती है और यह एकतरफ़ा और व्यक्तिगत फ़ायदे पर आधारित होती है। साथ ही यह हर व्यक्ति  के लिए अलग-अलग होती है। इसे मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। हो सकता है पति अपेक्षा रखता हो कि उसको चाय, नाश्ता, खाना आदि बिलकुल निश्चित समय पर चाहिए और पत्नी अपेक्षा रखती हो कि पति घर के छोटे-मोटे कार्यों को करने में उसकी मदद करे, शाम को उसके साथ थोड़ा समय बिताए।

दोनों की ही उम्मीद या अपेक्षा ग़लत नहीं है और ना ही ऐसी है जो पूरी ना की जा सकती हो।पर इसके बाद भी दोनों का रिश्ता सामान्य नहीं है क्यूँकि दोनों ने एक-दूसरे को झगड़े के पहले कभी बताया ही नहीं कि वे एक-दूसरे से क्या अपेक्षा रखते हैं। वे बस चाहते हैं या बल्कि यह कहना उचित होगा कि मानकर ही चलते हैं कि सामने वाला बिना इस विषय पर बात किए सब कुछ समझ जाए। आमतौर पर ऐसी अपेक्षा रिश्तों में सिर्फ़ तनाव पैदा करती है। दूसरी बात रिश्तों में उम्मीद, अपेक्षा होना एक धारणा या राय के समान होता है जो हर किसी के पास अपनी, अलग होती है। हर इंसान का अपना सोचने का तरीक़ा होता है, उसके अपने विचार होते हैं। इसी वजह से उनके विचार दूसरों से मेल नहीं खाते हैं और दोस्तों यही कलह की जन्मस्थली है।

आज के लिए इतना ही दोस्तों, आज हमने झगड़ा होने की मुख्य वजह को समझने का प्रयास करा है। कल हम रिश्तों में उम्मीद को किस तरह प्रबंधित (मैनज) करें इस विषय में सीखेंगे।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 
dreamsachieverspune@gmail.com