फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों कल के लेख पर मिली आपकी प्रतिक्रियाओं से मुझे बहुत अच्छे से एहसास हो गया कि यह विषय आपके लिए कितना मायने रखता है। समय पर ‘ना’, न कह पाना मेरी नज़र में आत्मसम्मान तक को नुक़सान पहुँचाकर, जीवन में सफल होने या  लक्ष्य पाने में लगने वाले समय को बढ़ा देता है। कल हमने ‘ना’ कहना सीखने के 10 शक्तिशाली सूत्रों में से प्रथम दो सूत्र सीखे थे, आइए आगे बढ़ने से पहले उन्हें एक बार संक्षेप में दोहरा लेते हैं-

प्रथम सूत्र - स्पष्ट लक्ष्य एवं प्राथमिकताएँ रखें
स्पष्ट लक्ष्य और प्राथमिकताएँ बनाकर योजनाबद्ध तरीक़े से उस पर कार्य करना आपको ‘लोग या वह व्यक्ति क्या कहेगा या क्या सोचेगा?’ से बचाकर, आपको ‘ना’ कहने के स्पष्ट कारण याद दिलाता है। जिससे आप ‘ना’ कहने के बाद भी अपनी सकारात्मकता को बरकरार रख पाते हैं। इस सूत्र को अपनी आदत बनाने के लिए अपनी पाँच प्राथमिकताओं को लिखकर ऐसे स्थान पर रखें जहां से वह आपको बार-बार दिखाई दे। ध्यान दीजिएगा, ‘ना’ कहकर आप, आपके जीवन में वाक़ई क्या महत्वपूर्ण है, उस पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाते हैं।

द्वितीय सूत्र - सामने वाले को निरुत्तर करते हुए अपनी प्राथमिकताएँ बताएँ
दोस्तों ‘ना’ इस तरह कहें कि सामने वाला आपकी ना को आसानी से स्वीकार सके और उसे ऐसा लगे जैसे आपके पास उस वक्त ‘ना’ करने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं था। इस प्रभावशाली तरीके को इस्तेमाल करने के लिए आपको अपनी कम्यूनिकेशन स्किल को बेहतर बनाना होगा। लेकिन याद रखें अगर आप ‘ना’ कहते समय उसे भविष्य की कोई आस बंधा रहे हैं तो हर हाल में अपने कहे हुए शब्दों का सम्मान करें, अपनी कही हुई बात के प्रति ईमानदार रहें। 

चलिए दोस्तों सीखते हैं ‘ना’ कहना सीखने के अगले 5 शक्तिशाली सूत्र-

तीसरा सूत्र - सामने वाले के प्रस्ताव पर आप कैसा महसूस करते हैं यह बताएँ 
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो आपके वैध कारणों के साथ ‘ना’ करने के बाद भी आपके ऊपर ‘हाँ’ कहने का दबाव बनाते हैं और आपको अपनी बात पर विश्वास दिलाकर मना लेते हैं। आमतौर पर सेल्समैन इस तरह से कार्य करते हैं। ऐसे लोगों से बचने के लिए वैध कारणों के साथ ‘ना’ कहते समय अपनी बात के अंत में यह भी बता दें कि उसके प्रस्ताव पर आप कैसा महसूस कर रहे थे। जैसा मैंने कल आपको एक उदाहरण में बताया था कि वेबीनेयर के लिए मना करते समय मैंने प्रस्तावक से कहा था, ‘आपका प्रस्ताव वाक़ई में अद्भुत है और निश्चित तौर पर यह मेरे लिए फ़ायदेमंद है। लेकिन अपने दैनिक रेडियो शो ‘ज़िंदगी ज़िंदाबाद’ और कॉलम ‘फिर भी ज़िंदगी हसीन है…’ के प्रति प्रतिबद्धता के चलते, चाहते हुए भी स्वीकारना सम्भव नहीं है।’ इसमें  मैंने उसे अपनी भावनाओं के बारे में भी पहले ही बता दिया था। ऐसा करना सामने वाले को आपकी प्राथमिकताओं का एहसास कराने के साथ-साथ इस बात का भी एहसास करवा देता है कि आपसे बहस करना या ‘हाँ’ करवाना आसान नहीं होगा।

चौथा सूत्र - अगर सम्भव हो तो मदद करें 
ना करने के बाद एकदम से बातचीत खत्म करने के स्थान पर अगर आपके लिए सम्भव है, तो सामने वाले की थोड़ी मदद कर दें। यह मदद एक अच्छी सलाह, ज्ञान या किसी अन्य व्यक्ति के बारे में सुझाव देकर की जा सकती है। वैसे दोस्तों मैं यह तरीक़ा अकसर काउन्सलिंग, लेखन या ट्रेनिंग के अपने व्यवसायिक कार्य में अपनाता हूँ। ऐसा करने से सामने वाले का उद्देश्य भी पूरा हो जाता है और आपकी प्राथमिकताएँ भी नहीं गड़बड़ाती।

पाँचवाँ सूत्र - ना करते समय अगर आप थोड़ा असहज या दोषी भी महसूस कर रहे हैं तो भी अपने निर्णय पर अडिग रहें
अगर आप ‘ना’ करने की वजह से थोड़ा असहज महसूस करते हैं या खुद को दोषी मान रहे हैं तो भी अपने निर्णय पर अडिग रहें। सिर्फ़ भावनाओं के आधार पर प्राथमिकताएँ बदलना आपको अपने लक्ष्य से दूर कर देता है। इसके विपरीत जब आप अपने निर्णय पर अडिग रहते हुए सामने वाले की दूसरे तरीक़े से मदद कर देते हैं तो आप धीरे-धीरे इस नकारात्मक भाव से बाहर आ जाते हैं और आप व सामने वाला, दोनों अपने जीवन में आगे बढ़ जाते हैं।

छठा सूत्र - याद रखें, सब को खुश नहीं रखा जा सकता है 
दोस्तों दुनिया में हर किसी को खुश और प्रसन्न रखते हुए अपने कार्य में सफल हो पाना सम्भव नहीं है। इसके विपरीत अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर निर्णय लेना आपको और आपके परिवार को खुश रख सकता है। वैसे भी याद रखिएगा, दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें आप कुछ भी करके प्रसन्न या खुश नहीं रख सकते हैं। वे अपनी उलझनों, विचारों और पुराने तरीकों से ही बंधे रहना चाहते हैं। वे आपसे मदद मिलने के बाद भी खुद के बुने जाल में ही उलझा रहना पसंद करते हैं। ठीक इसी तरह हर किसी की नज़र में आप अच्छे या उसके पसंदीदा व्यक्ति नहीं बन सकते हैं। इसलिए सिर्फ़ लोगों को खुश या संतुष्ट रखने के लिए हाँ कहने से बचें।

सातवाँ सूत्र - अपने आत्मसम्मान का ध्यान रखें 
दोस्तों मैंने अपने अनुभव से सीखा है कि जब हम अपने आत्मसम्मान का ख़याल नहीं रखते हैं तो हम अपने समय की क़ीमत भी पहचानने में असफल रहते हैं क्यूँकि जब तक आप स्वयं को महत्व या प्राथमिकता नहीं देते हैं तब तक सामने वाला भी आपके समय और ऊर्जा के मूल्य को नहीं समझता। इसके विपरीत जब आप अपने आत्मसम्मान को महत्व देते हुए अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर कार्य करते हैं तो आप अपने आत्मसम्मान में वृद्धि करते हैं। यह बढ़ा हुआ आत्मसम्मान आपको अपनी ऊर्जा और समय का सही उपयोग करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे आप अपनी प्राथमिकताओं और लक्ष्य को समय पर पा पाते हैं।

आज के लिए इतना ही दोस्तों आशा करता हूँ उपरोक्त सूत्र आपको अपना जीवन बेहतर बनाने में मदद करेंगे। कल हम ‘ना’ कहना सीखने के अंतिम तीन शक्तिशाली सूत्र सीखेंगे।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 
dreamsachieverspune@gmail.com