फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों आज के लेख की शुरुआत एक नई कहानी के साथ करते हैं और उससे जीवन को बेहतर बनाने का एक नया मंत्र सीखते हैं। महाराज कृष्णदेवराय को तेनालीराम से बेढंगे सवाल पूछने में बड़ा ही आनंद आता था। वे हमेशा ऐसे सवाल पूछते जिसका जवाब देना हर किसी को नामुमकिन सा लगता लेकिन तेनालीराम भी हार मानने वाला नहीं था। वो भी महाराज को ऐसा जवाब देता कि वे कुछ समझ ही नहीं पाते,अब आगे क्या पूछें। एक बार महाराज ने तेनालीराम से पूछा, ‘क्या तुम अपने राज्य के कौवों की संख्या बता सकते हो ?’ 

तेनालीराम ने कहा, ‘जी महाराज ! बिल्कुल बता सकता हूँ।’ महाराज पुनः बोले, ‘तेनालीराम, कौवों की बिल्कुल सही संख्या बतानी है, ये नहीं कि तुम अंदाज़ा लगाकर कुछ भी बोल दो।’ तेनालीराम मुस्कुराते हुए बोले, ‘जी महाराज, मैं कौवों की बिल्कुल सही संख्या ही बताऊँगा। आप विश्वास रखें।' तेनालीराम का विश्वास देख महाराज बोले, ‘अगर तुमने गलत जवाब दिया तो तुम्हें मृत्युदंड दिया जाएगा।’ 

तेनालीराम ने साहस के साथ अपनी मुस्कुराहट बरकरार रखते हुए कहा, ‘जी महाराज, मुझे आपकी शर्त मंज़ूर है। मैं कल आपके प्रश्न का जवाब दूँगा।’ तेनालीराम के इतना बोलते ही उनके विरोधी मन ही मन खुश होने लगे। उन्होंने सोचा कि आज तो तेनालीराम बुरी तरह फँस गए हैं। भला कौवों की गिनती कैसे की जा सकती है? तभी महाराज ने सभा भंग कर दी और अगले दिन तेनालीराम को सभा में कौवों की सही संख्या के साथ हाज़िर होने का हुक्म दिया।

अगले दिन तेनालीराम समय से पहले सभा में पहुँच गए। महाराज ने आते ही उनसे अपने प्रश्न का उत्तर माँगा। तेनालीराम बोले, ‘महाराज हमारे राज्य में एक लाख सत्रह हज़ार पांच सौ पचास कौवे हैं।’ महाराज ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, ‘क्या? हमारे राज्य में इतने कौवे हैं?’ तेनालीराम बोले, ‘हाँ महाराज, अगर आपको यकीन न हो तो आप गिनवा कर देख सकते हैं।’

तेनाली के इतना कहते ही महाराज बोले, ‘अगर गिनती में कुछ कम या ज्यादा निकले तो?’ तेनालीराम तुरंत बोले, ‘महाराज, ऐसा हो ही नहीं सकता। फिर भी अगर ऐसा हो भी गया तो निश्चित तौर पर हमारे राज्य के कुछ कौवे अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्य में गए होंगे या फिर दूसरे राज्य के कुछ कौवे हमारे राज्य में अपने रिश्तेदारों से मिलने आए होंगे। इस स्थिति में तो कौवों की संख्या कुछ कम या ज्यादा हो सकती हैं। वरना इसकी कोई सम्भावना ही नहीं है। तेनालीराम का उत्तर सुनकर महाराज निरुत्तर हो गए और मुस्कुराने लगे परन्तु इसके विपरीत उनके विरोधी बेचारे हाथ मलते रह गए क्योंकि तेनालीराम ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से उनकी ख़ुशी पर पानी जो फेर दिया था।

दोस्तों यह कहानी मुझे अभी कोरोना की दूसरी लहर से उपजी स्थिति और उस पर समाज, सरकार और मीडिया की प्रतिक्रिया देखकर यादआई। हालाँकि मेरा उद्देश्य इस विश्लेषण से सरकार, मीडिया, समाज या किसी अन्य को सही या ग़लत ठहराना नहीं है। मैं तो बस एक बार पूरी स्थिति पर आपका ध्यान खींचकर  वर्तमान व्यवस्था में सांख्यिकी के महत्व को समझाना चाहता हूँ। 

आईए सबसे पहले फ़ौरी तौर पर कोरोना की दूसरी लहर पर नज़र घुमाते हैं। एक ओर जहाँ इस लहर ने हमें, हमारे परिवार में किसी ना किसी को बीमार किया है, वहीं दूसरी ओर हमारे परिचितों में से किसी ना किसी ने अपने परिवार के किसी सदस्य को हमेशा के लिए खो दिया है। अस्पताल भरे हुए हैं, ऑक्सिजन, मेडिकल उपकरणों और दवाओं की कमी साफ़ नज़र आ रही है। आम लोगों की कमर आर्थिक और भावनात्मक मोर्चे पर टूटी हुई है।
 
दूसरी ओर बाज़ार में व्यापारियों का एक वर्ग मुनाफ़ाख़ोरी के लिए दवाई, सिलेंडर, मशीनें आदि के भरपूर स्टॉक के साथ तैयार नज़र आ रहा है एवं तमाम सख़्तियों के बावजूद क़ानून से बचते हुए अपने हितों की पूर्ति में लगा हुआ है। समाज का एक और तबका अपने-अपने राजनैतिक मकसदों का साधने के लिए स्थितियों और सच्चाई को तोड़-मरोड़कर आम लोगों के बीच परोस रहा है। वह यह सोचना ही नहीं चाहता है, कि इस स्थिति की असली जड़ क्या है या आज हम इस विकट परिस्थिति से कैसे निपट सकते हैं। 

तीसरी ओर सरकार कभी आँकड़ों के साथ खेलती नज़र आती है तो कभी बयानों से खुद को पूरी तरह तैयार बताती है। कुछ राजनैतिक दल इसे एक मौके के तौर पर देख रहे हैं। कुछ दलों ने ऊँट किस करवट बैठेगा कुछ दिन रुककर इसका अंदाज़ा लगाने का प्रयत्न करा और फिर अपने फ़ायदे के हिसाब से रुख़ तय करा। उन्हें लगता है कि वे इस परेशानी की आड़ में आने वाले समय में सत्ता में आ जाएँगे। दोस्तों अपने हितों को साधने में हम यही भूल गए हैं कि जिन्होंने अपने परिवार के सदस्य को खोया है उनके लिए आँकड़े कोई मायने नहीं रखते हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट, आंकलन और अंतराष्ट्रीय स्थिति को देख अंदाज़े ने हमें तैयारी के लिए काफ़ी समय दिया था लेकिन स्व-हित साधने के चक्कर में हमने उसे गँवा दिया। इस वक्त स्थिति को तीन तरह से सम्भालने का प्रयास किया जा रहा है। पहला लोगों द्वारा मैदान में उतरकर मोर्चा सम्भालकर, दूसरा आँकड़ों के आधार पर पॉलिसी बनाकर और तीसरा पैसों को प्राथमिक आधार बनाकर। 

ठीक यही स्थिति दोस्तों आमतौर पर बाज़ार में देखने को मिलती है। बाज़ार मैं भी इसी तरह तीन तरह की सोच वाले लोग नज़र आएँगे पहले वे जो मौके या मौसम के हिसाब से व्यापार करते हैं। दूसरे वे जो काग़ज़ पर बहुत बड़ी फूल प्रूफ़ प्लानिंग बनाकर बाज़ार जीतने का प्रयास करते हैं और तीसरे वे लोग जो आँकड़ों को आधार बनाकर ज़मीनी स्तर पर कार्य करके बाजार में अपनी बढ़त बनाते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह तेनालीराम ने विपरीत परिस्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ लिया था।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 
dreamsachieverspune@gmail.com