कल मेरी मुलाक़ात दो बिलकुल विपरीत सोच रखने वाले वित्तीय विशेषज्ञों/व्यापारियों  से हुई। बातचीत का मुख्य उद्देश्य कोरोना की वजह से आई मंदी को लेकर व्यापारियों को किस तरह कार्य करना चाहिए, इस पर एक वेबिनैर को प्लान करना था। 

एक व्यापारी का मत था, अभी अचानक बाज़ार में बहुत सारी नई सम्भावनाएँ नज़र आ रही हैं वहीं दूसरा व्यापारी इसे अपने जीवन में आई सबसे बड़ी मंदी बता रहा था। अगर मैं स्वयं की बात करूँ तो मुझे उन दोनों की बातचीत (बहस) से बहुत कुछ नया सीखने और बाज़ार को अलग-अलग नज़र से देखने का मौक़ा मिला।

काफ़ी देर तक जब कोई नतीजा निकलता हुआ नहीं दिखा, तो मैंने बीच में बोलते हुए उन्हें एक कहानी सुनाई। चलिए आज के इस एपिसोड की शुरुआत हम उसी कहानी से करते हैं।

एक ख़रगोश अपने दो बच्चों के साथ एक खेत में रहता था। फसल की वजह से ख़रगोश को खाने और छुपने में आसानी रहती थी। उनका जीवन तो बड़े मज़े से चल रहा था, कब कुछ माह गुजर गए उन्हें पता ही नहीं चला।

पास के खेत में फसल की कटाई देखकर ख़रगोश के बच्चों को थोड़ा डर लगने लगा। वे सोच रहे थे कि अगर फसल कट गई तो हम कहाँ रहेंगे। ख़रगोश ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘तुम घबराओ मत, किसान की बातों से हमें पता चल जाएगा कि फसल कब कटेगी तब हम दूसरे नए घर में रहने चले जाएँगे।’

एक दिन किसान ने खेत पर पकी फसल देखकर खुश होते हुए कहा, ‘वाह! इस बार फसल कितनी अच्छी हुई है, कल मैं अपने पड़ोसी किसान से कहूँगा कि तुम मेरी फसल भी काट देना।’ इतना कहकर किसान अपने घर चला गया। ख़रगोश के आते ही उसके बच्चों ने उसको घर छोड़ने का कहकर किसान वाली बात बताई। ख़रगोश ने कहा, ‘अभी नहीं, तुम लोग आराम से रहो।’ पिता की बात सुनकर ख़रगोश के बच्चे थोड़े से विचलित हुए, लेकिन अगले ही दिन आश्चर्यचकित थे क्यूँकि पड़ोसी फसल काटने के लिए नहीं आया।

कुछ दिन बाद किसान वापस आया और फसल को देखकर बोला, ‘अरे पड़ोसी ने तो मेरी फसल काटी ही नहीं, कल मैं अपने रिश्तेदारों को बोलता हूँ कि वे फसल को काट दें।’ इतना कहकर किसान वहाँ से चला गया। ख़रगोश के आते ही फिर से उसके बच्चों ने उसको किसान वाली बात बताते हुए कहा, चलो अब इस घर को छोड़ने का समय आ गया है। ख़रगोश ने फिर बच्चों से कहा, ‘अभी नहीं, तुम लोग आराम से रहो।’ बच्चों को अभी भी पिता की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था फिर भी वे अगले दिन का इंतज़ार करने लगे। इस बार भी पिता की बात सही निकली।

फिर कुछ दिन और गुजर गए, बच्चे पहले जैसे ही खेत में मस्ती करते हुए ख़ुशी-ख़ुशी दिन गुज़ारने लगे। किसान एक दिन फिर खेत पर आया और फसल को देख कर बोला, ‘रिश्तेदारों ने भी फसल नहीं काटी, अब कल मैं खुद आकर इस फसल को काटूँगा।’ इतना कहते हुए वो वहाँ से चला गया।

ख़रगोश के आते ही फिर से उसके बच्चों ने उसको किसान वाली बात बताई, बात सुनते ही ख़रगोश ने बच्चों से कहा, ‘बच्चों, अब इस खेत को छोड़कर जाने का वक्त आ गया है। हम आज रात को ही यहाँ से चले जाएँगे।’ ख़रगोश की बात सुनकर दोनों बच्चे हैरान थे। उन्होंने ख़रगोश से कहा, ‘इस बार ऐसा क्या हुआ, जो आप इस खेत को छोड़ने के लिए कह रहे हो? ऐसी ही कुछ बात पिछली बार भी तो किसान ने कही थी।’ ख़रगोश ने बच्चों की जिज्ञासा शांत करते हुए कहा, ‘पहले दोनों बार वह किसान कटाई के लिए दूसरों पर निर्भर था, अपना कार्य दूसरों पर डाल कर वह अपना पल्ला झाड़ लेता था। इस बार उसने यह ज़िम्मेदारी खुद अपने ऊपर ली है इसलिए वह अवश्य आएगा और उसी रात ख़रगोश अपने दोनों बच्चों को लेकर कहीं दूर चला गया। 

जो व्यवसायी इस वक्त को अपने जीवन का सबसे बुरा वक्त मान रहे हैं, असल में वे अपनी पुरानी कार्यप्रणाली और तौर तरीक़ों पर अधिक निर्भर हैं। आप स्वयं सोच कर देखिए, इन बदली हुई प्राथमिकताओं और परिस्थितियों में क्या पुराने तरीक़ों से नए परिणाम पाए जा सकते हैं? 

इस वक्त हमें अपनी सर्विस अथवा उत्पाद को ‘न्यू नार्मल’ के अनुरूप बदलाव करते हुए प्रशिक्षित कर्मचारियों के द्वारा ग्राहकों तक पहुँचना होगा। अगर आवश्यकता हो, तो विषय विशेषज्ञों की सहायता लेने में भी कोई बुराई नहीं है। मेरा मानना है कि जिस दिन हमने अपने भविष्य का निर्माण व्यापार या स्वरोज़गार के माध्यम से करने का निर्णय  लिया था उसी दिन यह तय हो गया था कि परिस्थिति या प्राथमिकताएँ कुछ भी क्यूँ ना हो, हम स्वयं अपने विकास के लिए ज़िम्मेदार रहेंगे।


इन विषम, विकट एवं विपरीत परिस्थिति में भी एक आत्मनिर्भर व्यवसायी को अपने इसी निर्णय को याद करते हुए, जागरूक रह कर, मौक़ों को पहचानना या पैदा करना होगा। हो सकता है आपको कुछ बड़े बदलाव करने पड़े, कुछ बड़े निर्णय लेने पड़े या एक बार फिर अभी तक इकट्ठे किए गए अनुभवों को काम में लेते हुए फिर से शुरुआत करना पड़े, पर इससे फ़र्क़ क्या पड़ता है? हम उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी क़िस्मत स्वयं लिखने का निर्णय लिया था। बस याद रखिएगा ईश्वर भी उसी के साथ है जो स्वयं के साथ है। 

-निर्मल भटनागर 
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर