जंगल में एक बहुत पहुँचे हुए संत रहते थे। वे नियमित रूप से सुबह-शाम पूजा-पाठ, ध्यान करते थे। इसके बाद आश्रम के सभी जानवरों को खिलाना एवं पेड़-पौधों को समय-समय पर खाद-पानी देना उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा था। लोग बहुत दूर-दूर से उनके पास ज्ञानार्जन के लिए आते थे। रोज़ प्रवचन के ज़रिए उन्हें व शिष्यों को शिक्षित करना संत का नियम था। 

एक दिन कहीं से उनके आश्रम में एक बिल्ली का बच्चा भटक कर आ गया। संत ने उस भूखे-प्यासे बिल्ली के बच्चे को दूध-रोटी खिलाई। अब वह बिल्ली का बच्चा भी आश्रम में ही रहने लगा एवं धीरे-धीरे संत के साथ घुल-मिल गया। संत के साथ अब एक नई समस्या उत्पन्न होने लगी। जैसे ही वे ध्यान में बैठते, बिल्ली के बच्चे को लगता वो अब उसके साथ खेल नहीं रहे है, उसे प्यार नहीं कर रहे हैं। वो उछलकर कभी उनकी गोदी, तो कभी उनके कंधे या सर पर चढ़ जाता था। 

एक दिन संत ने अपने शिष्य को बुला कर कहा, ‘देखो आज से मेरे ध्यान करने के पूर्व तुम इस बिल्ली के बच्चे को पेड़ से बांध दिया करो।’ गुरुजी की आज्ञा के अनुसार अब वह शिष्य रोज़ उस बिल्ली को पेड़ से बांधने लगा। धीरे-धीरे यह आश्रम में एक नियम सा बन गया। 

संत की मृत्यु के पश्चात उनके सबसे काबिल शिष्य को उनकी गद्दी सौंपी गई। शिष्य बिलकुल अपने गुरु के सिखाए रास्तों पर चलता था और अपने गुरु की तरह ही नियमित दिनचर्या का पालन करता था जिसमें ध्यान से पूर्व बिल्ली को बांधा जाना भी था।

ख़ैर यहाँ तक तो सब ठीक था लेकिन एक दिन बहुत बड़ी समस्या आ गई वो बिल्ली ही मर गई। आश्रम में इस आपात स्थिति में मंत्रणा की गई कि अब क्या किया जाए। ख़ैर सब ने एकमत होकर निर्णय लिया कि हमारे गुरुजी जब तक बिल्ली को पेड़ से नहीं बांध देते थे ध्यान पर नहीं बैठते थे। इसका पालन आगे भी किया जाएगा और कुछ लोगों को एक नई बिल्ली खोज कर लाने की ज़िम्मेदारी दी गई। आख़िरकार कहीं दूर गाँव से एक बिल्ली आश्रम लाई गई फिर आश्रम में ध्यान, पूजा-पाठ शुरू हुआ।

दोस्तों विश्वास कीजिएगा उसके बाद ना जाने कितनी बिल्लियाँ और ना जाने कितने संत इस दुनिया से विदा हो चुके हैं लेकिन आज तक भी जब तक बिल्ली पेड़ से ना बांध दी जाए आश्रम में ध्यान शुरू नहीं होता। सभी शिष्यों का मानना था कि हमारे सभी गुरुजी जो करते रहे, वो गलत तो नहीं हो सकता। कुछ भी हो जाये हम बिल्ली को बांधना छोड़ नहीं सकते। 

वैसे तो यह कहानी सब कुछ कह देती है। लेकिन फिर भी सोचिए और गौर कीजिए अपनी पाली हुई ऐसी बिल्लियों पर। जी हाँ दोस्तों, ऐसी एक नहीं हमने अनेक बिल्लियाँ पाली हुई हैं, रूढ़िवादिता, परम्परा, अंधविश्वास, आदतों की बिल्लियाँ हमने पाल रखी हैं। जैसे-
1)    जब तक मैं गुटका, सिगरेट, दारू आदि नहीं लूँगा नींद नहीं आएगी।
2)    मेरे लिए तो यह दिशा ही ठीक नहीं है।
3)    जिस पर भी मैंने विश्वास करा है सब ने धोखा ही दिया है।
4)    यह पढ़ना, सीखना या करना मेरे बस की बात नहीं है। जैसे सेल्स या यह काम तो मेरे लिए करना सम्भव ही नहीं है।
5)    कुछ भी कर लो पैसा या समय हाथ में बचता ही नहीं है।

दोस्तों मैंने यहाँ आपको कुछ साधारण सी बिल्लियों के बारे में बताया है लेकिन एक बार अपनी पाली हुई बड़ी बागड़ बिल्लियों पर गौर कर के देखिएगा, एक नहीं अनेक नज़र आएँगी। जब तक हम उन बागड़ बिल्लियों से निजात नहीं पाएँगे, जीवन में किसी ना किसी तरह का अवरोध या स्वयं को बंधा हुआ पाएँगे।

अगर ज़िंदगी को काटना नहीं, जीना है तो रूढ़िवादिता, परम्परा, अंधविश्वास, आदतों की बिल्लियों को और ज़्यादा पनपने ना दें। ऐसी किसी भी चीज़ पर यक़ीन करने से पहले एक बार अपने अंदर झांके और देखें कहीं मेरे अंदर ही तो किसी बदलाव की ज़रूरत तो नहीं है। कई बार विपरीत परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए हमें सिर्फ़ कुछ बिल्लियों को छोड़ना पड़ता है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर