फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों कई बार हम जैसा सोचते हैं वैसा परिणाम अपने जीवन में पा नहीं पाते हैं और ऐसे में कई बार हम अपनी परिस्थिति या फिर क़िस्मत को दोष देने लगते हैं। पर एक बार सोच कर देखिए दोस्तों, क्या जीवन में घटने वाली हर घटना के लिए दूसरों, परिस्थिति या क़िस्मत को दोष देना उचित है? शायद नहीं, मैं ऐसा क्यूँ कह रहा हूँ समझाने के लिए आपको एक कहानी सुनाता हूँ।

बात कई वर्ष पुरानी है, एक गाँव में बहुत ही उच्च क्वालिटी का पनीर बेचने वाला व्यापारी रहता था। दूर-दूर से लोग उससे पनीर लेने आया करते थे। लेकिन कई बार पनीर खत्म हो जाने की वजह से उन्हें ख़ाली हाथ ही लौटना पड़ता था। पनीर ख़रीदने वाले लोगों में एक उसी गाँव का फल बेचने वाला व्यापारी था। उसे भी उक्त व्यक्ति के यहाँ का पनीर बहुत पसंद था। एक दिन उसके मन में विचार आया कि क्यूँ ना ऐसा कुछ किया जाए जिससे मुझे यह उच्च गुणवत्ता वाला पनीर रोज़ मिलता रहे।

अचानक उस फल वाले व्यापारी के मन में एक विचार कौंधा और उसने पनीर बेचने वाले व्यापारी को अपने घर पर चाय-नाश्ते के लिए आमंत्रित किया। तय दिन पनीर बेचने वाला व्यापारी चाय-नाश्ते के लिए फल बेचने वाले व्यापारी के घर पहुँचा। चाय-नाश्ते के बाद फल बेचने वाले व्यापारी ने पनीर बेचने वाले से कहा, ‘मैं रोज़ बाज़ार से पनीर लाता हूँ और उसी तरह तुम भी बाज़ार से रोज़ फल लाते हो। एक तरीक़ा ऐसा है जिससे हम दोनों को ही ना सिर्फ़ अच्छा सामान मिलेगा बल्कि यह एक लाभप्रद सौदा भी बन जाएगा।’ पनीर बेचने वाले व्यापारी ने तुरंत प्रश्न करा, ‘आपका विचार अच्छा है लेकिन हम किस तरह इसे अमल में ला सकते हैं?’

फल बेचने वाला व्यापारी बोला, ‘यह बहुत आसान है, मैं रोज़ तुम्हें एक किलो सर्वश्रेष्ठ क्वालिटी के फल दूँगा उसके एवज़ में तुम मुझे रोज़ मुझे अच्छी क्वालिटी का पनीर देना। इससे हम दोनों को ही शुद्ध और अच्छा खाने का सामान मिलता रहेगा। पनीर बेचने वाले व्यापारी को उसका यह सुझाव बहुत अच्छा लगा उसने तुरंत इसके लिए हाँ कर दिया। अगले दिन से ही फल वाले ने इस पर अमल करना शुरू कर दिया। रोज़ सुबह उसका नौकर एक थैली में फल लेकर पनीर वाले के यहाँ जाता और वहाँ से पनीर लेकर वापस आ जाता।

घर बैठे ही अच्छा सामान मिलने की वजह से दोनों ही व्यापारी खुश रहने लगे। कई माह तक सब कुछ इसी तरह अच्छा चलता रहा। एक दिन फल विक्रेता के मन में विचार आया क्यूँ ना तोल कर देख लिया जाए कि पनीर वाला पूरा 1 किलो पनीर दे रहा है या नहीं। उस दिन पनीर आते ही फल विक्रेता ने उसे तोल कर देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ क्यूँकि पनीर मात्र 800 ग्राम निकला। वह बहुत खिन्न था, उसका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर था, उसने आव-देखा ना ताव, वह सीधा पंचायत के पास गया और पनीर वाले के नाम से शिकायत कर दी।

पंचायत ने पनीर वाले को बुलाया और उसे फल वाले द्वारा उस पर लगाए इल्ज़ाम के बारे में बताया और उससे सामान कम देने का कारण पूछा। पनीर वाले ने एकदम शांत रहते हुए पंचायत से कहा कि वह फल वाले के उस नौकर को बुलाए जो उसकी दुकान से पनीर लेकर आता है। कुछ ही देर में नौकर के वहाँ आते ही पनीर विक्रेता बोला, ‘पंच महोदय, मेरे पास तोलने के लिए 1 किलो का बाट (वजन) नहीं है। मैं हमेशा यह नौकर जो फल लेकर आता था उसे ही तराज़ू के एक पलड़े में रखकर दूसरे में पनीर रख के तोल कर दे दिया करता था। इस बात की पुष्टि आप इस नौकर से कर सकते हैं। नौकर की स्वीकारोक्ति सुनते ही मामला पूरी तरह स्पष्ट था।

जी हाँ दोस्तों जिस तरह फल वाले को उतना ही पनीर मिल रहा था जितना वो फल दे रहा था, ठीक उसी तरह हम भी जीवन में उतना ही पा पाते जितना हम प्रयास करते हैं। अगर आपको लगता है कि आपको फल बराबर नहीं मिल रहा है तो सबसे पहले हमें अपने अपने प्रयास को जाँचना चाहिए, उसमें कहाँ कमी रह गई है? उसे पहचानने का प्रयास करें और जब उसे पहचान जाए तो ग़लतियों को सुधार कर एक बार फिर से शुरुआत करें और सफलता प्राप्त करें। याद रखिएगा दोस्तों, ईश्वर हमें जितना हम चाहते हैं उतना नहीं बल्कि जितने की हम पात्रता रखते हैं उतना देता है। अगर आप ज़्यादा पाना चाहते हैं तो अपनी पात्रता बढ़ाए।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 
dreamsachieverspune@gmail.com